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आत्मकल्याण के लिए करें मानव शरीर का उपयोग : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

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-मानव शरीर से संसार सागर को तरने को आचार्यश्री ने किया अभिप्रेरित

 

-साध्वीवर्याजी ने उपस्थित जनता को किया सम्बोधित  

 

-बर्सोवा एमएलए सहित अन्य गणमान्यों ने किए आचार्यश्री के दर्शन  

अंधेरी, मुम्बई (महाराष्ट्र)।मायानगरी मुम्बई के अंधेरी उपनगर में आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने तिलक उद्यान में बने महाश्रमण समवसरण में उपस्थित जनता को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि मानव शरीर बहुत महत्त्वपूर्ण है। मानव शरीर जैसी शरीर न तो नारकीय गति के जीवों को प्राप्त है और न ही देव गति के जीवों को। मनुष्यों के पास जो औदारिक शरीर है, उसके माध्यम से वह मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। इस शरीर से जो साधना की जा सकती है, वह किसी अन्य शरीर से संभव नहीं है। इस औदारिक शरीर को साधना का मंदिर कहा जाता है कि इसे व्याधियों का मंदिर भी कहा जाता है। सारी व्याधियां भी इसी शरीर को प्राप्त हैं। इसलिए शास्त्रकारों ने बताया कि जब तक आदमी को बुढ़ापा पीड़ित न करने लगे, आदमी को धर्म का आचरण कर लेने का प्रयास करना चाहिए। 

 

आदमी को अपनी आत्मा के कल्याण के लिए इस मानव शरीर का सदुपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। जब तक बुढ़ापा, रोग और मृत्यु न आ जाए, तब तक आदमी को अपने शरीर से धर्माचरण करते हुए अपनी आत्मा के कल्याण का प्रयास करना चाहिए। समय के साथ इन्द्रियों की शक्ति भी क्षीण होती जाती है। कानों से सुनाई नहीं देना, आंखों से कम दिखाई देना, हाथ-पैरों में कंपन होने लगे तो भला धर्म-साधना भी कैसे संभव हो सकती है। शरीर में जब तक कोई रोग न लगा हो तब तक धर्म-ध्यान करने का प्रयास करना चाहिए। मानव शरीर एक नौका के समान है, जीव इसका नाविक है और यह संसार सागर के समान है। महर्षि लोग इस भवसागर से पार पाते हैं। मनुष्य को भी चाहिए कि धर्म-अध्यात्म की साधना करते हुए और सेवा के माध्यम से इस संसार रूपी समुद्र को शरीर रूपी नौका से तर लेने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपने जीवन में धर्म, ध्यान, धार्मिक-आध्यात्मिक सेवा, परोपकार आदि का कार्य निरंतर करने का प्रयास करना चाहिए। सूर्य, चन्द्रमा, जल, पृथ्वी आदि कितना उपकार करते हैं। इनसे और संतों के लिए जीवन से परोपकार की प्रेरणा ली जा सकती है। आचार्यश्री तुलसी और आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ने कितनी-कितनी मानवता की सेवा की है। इसलिए आदमी को अपने इस शरीर के माध्यम से धर्म का आचरण कर सद्गति की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। 

 

आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने भी जनता को उद्बोधित किया। अपने आराध्य के अभिनन्दन में स्थानीय स्वागताध्यक्ष श्रीमती प्रिया उमेद नाहटा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। अंधेरी ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी। तेरापंथ युवक परिषद-अंधेरी के युवकों ने गीत का संगान किया। आज के कार्यक्रम में बार्सोवा की एमएलए भारती लावेकर ने भी आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति देते हुए आचार्यश्री से पावन आशीर्वाद प्राप्त किया।  

 

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